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Wednesday, December 31, 2014

कभी तो सोचता हूँ

कभी तो सोचता हूँ मैं भी
कि मेरा लक्ष्य क्या है?
पता नहीं, मेरा अस्तित्व भी
मझधार के किस ओर मंडरा रहा है?
या फिर, किसी पर-कटे परिंदे सा 
एक ऊंचाई पर बने रहने को फड़फड़ा रहा है?
क्या मैं सही राह पर भी हूँ?
या फिर दिशाहीन हो भटक रहा हूँ?

कितनों ने उंचाईयां छू ली 
और कितने ही संघर्ष में पिस भी गए 
मैं भी तो और उड़ना चाहता हूँ
पता नहीं, किस पंख की तलाश में हूँ?
कभी हौसले टूटते से लगते 
कि शायद टूट कर बिखर जाऊँगा 
सहम सा जाता हूँ शायद 
या, सचमुच किसी का इंतज़ार है, 
फिर कभी हौसले संभाल कर 
आसमां की तरफ एक-टक देखता हूँ 
शायद कोई तो सुराख मिले 
जो मैंने बनाया हो, अपनी मंजिल की ओर 
या फिर, बस चलता चला जा रहा हूँ?
उम्मीद में इतने कि अपनी मंजिल ढूंढ पाउँगा 
उम्मीद का भी क्या भरोसा 
कभी सच में टूट गयी तो?
क्या मैं मायूस हो कर कहीं,
सच में बिखर तो नहीं जाऊँगा?

फिर तो बस, एक ही ख्याल आता है
खुद पर भरोसा नहीं छोड़ूंगा कभी 
कुछ राह भटक गए भी तो क्या 
नए फिर हम ढूंढ लाएंगे 
हाँ, मानता हूँ संघर्ष होगा बहुत 
पर फिर, बहुत कुछ सीखा भी तो होगा मैंने 
एक नयी उम्मीद की धार मिलेगी
शायद उसी मझधार के बीचो-बीच
या फिर, शायद सच में पंख ढूंढ लाऊंगा 
और अपनी उड़ान पूरी कर पाउँगा 
यूँ हैं जिंदगी के मझधारों में संघर्ष करता
अक्सर ऐसा ही कुछ सोचता रहता हूँ मैं

Sunday, November 03, 2013

पर, खुश हूँ मैं

क्यूँ दरारों की ज़रूरत थी,
कि अपने रास्ते अलग हो सकें?
होठों पर मुस्कराहट,
और आँखें नम थीं
कि यादों की गहराई में
हम खो सकें?
दिल के मासूम टुकड़ों से
पूछा ना कभी
कि लापरवाह इश्क़ की छाव में
तुम इतना क्यूँ इतरा रहे थे?
बेचारा, आने वाले
इम्तेहां से बेख़बर जो था।
क्यूँ छोड़ दिया उसी हाल पर
कि नादानियों से शाय़द सीख सके?

ख़ैर, छोड़ो
इक सुकून है बस इस बात का
कि तुम्हें इतने क़रीब से जाना
रास्ते अलग हुए तो क्या
यादों की रौशनी साथ है ना
उन्हीं मासूम दिल के टुकड़ों को 
जोड़ कर, फिर चल पड़ा हूँ मै
राह नयी है, साथ तुम भी तो नहीं हो
पर, खुश हूँ मैं
हसीं वादियों के बीच,
खुले आसमां के नीचे,
दरिया की कल-कल धारा कि गोद में,
उन यादों को दोहराऊंगा मैं
खुशियों से भरा एक अपना,
छोटा सा जहाँ, बनाऊंगा मैं। 

Monday, July 01, 2013

O' you nightingale eyes

O' You nightingale eyes
You saw me through
my weirdest replies

I wasn't shy
Or, maybe was I
I saw you smile
Couldn't look away for a while

You knew it right then
What my heart had spoken
I did not wanna accept
Neither I wanted any regret

Yes, I was confused
When you approached
I tried to look away
Then, I heard you say "Hey"
Through my pounding heart
You perhaps, got a reply

I tried to be calm
So brought up a smile
We went for a walk
Romance was our talk

The evening was bright
Under beautiful moon-light
As I held your hand
Felt if I could stop slipping of the sand

A thank you, from the heart
For taking the start
For breaking the ice
O' you nightingale eyes
You saw me through
my weirdest replies

Tuesday, February 26, 2013

शब्द खोये से क्यूँ हैं


शब्द खोये से क्यूँ हैं, 
शायद किसी की तलाश में हैं
जब कभी उस पार झाँकने की कोशिश करता हूँ मैं 
एहसास एक ऐसा झकझोर जाता है मुझे 
उन्हें सामने न देख कर 
कई टुकड़ों में बिखर जाता हूँ मैं

कई बार कोशिश की, 
यादों को शब्दों में पिरोने की
शायद, वापस जा सकूं, 
जहाँ अपने रास्ते अलग हुए थे 
कशिश वो सीने में आज भी है, 
शायद शब्द इसलिए कतरा रहे हैं 
इतना दर्द संभाल कर भी 
जीता रहा हूँ मैं इत्म्नान से 
शब्दों को डर है मेरे हौसले से 
शायद उन यादों के भंवर में 
एक बार फिर टूट कर बिखर जाऊँगा मैं ।

Thursday, August 02, 2012

क्यूँ तुम्हें खो दिया


खुद से, खुद के सवालों में मैं यूँ उलझा हुआ सा हूँ
कुछ पाने की कोशिश में कहीं खोया हुआ सा हूँ
एक सवाल जाने क्यूँ इतना तडपा रहा है मुझे
यादों के अंधियारे में उसका उत्तर ढूंढ रहा हूँ
जीवन के झरोखे का आइना बना कर, शायद
अपने चेहरे की मायूसी का मतलब ढूंढ रहा हूँ

यादों के भंवर में हीं मोती ढूंढ रहा था पर
शायद, किसी बवंडर की ओर रुख ले लिया
न चाहते हुए भी कुरेद रहा हूँ अपने हीं जख्मों को
डर भी है, फिर से डूबने का, और दर्द भी, क्यूँ तुम्हें खो दिया
अनजान राहों पर भी हाथ थामे तुम्हारा चला जाता था मैं
आग़ोश में तेरे बस यूँ हीं, सपनों में खो जाता था मैं
एक विश्वास था वो दामन, पर जाने कब, कैसे टूट गया
शायद शीशे के सपने थे, कभी किसी पत्थर से टकरा गए
साथ तुम्हारे हो कर भी, न जाने कैसे तुमको खो दिया!

Wednesday, March 14, 2012

पड़ाव

वक़्त बेवक्त ज़माने की बंदिशों में
एक आज़ाद परिंदे सा एहसास,
जो पलता रहा कलेजे में बरसों से
खुल कर साँस लेने का वो साज़,
जीने की चाहत की तलाश में एक भंवरे सा,
ता-उम्र, फूलों पर भटकता हुआ सा अंदाज़|

ख्वाहिशें अपनी थीं, रास्ते भी अपने से
दो कदम इस ओर तो, दो चल पड़े उस ओर
मुसाफ़िरों की महफ़िल, मयकदे जैसी मंजिल,
किसी मुसाफिर से मुहब्बत में डूबा कभी दिल,
कभी उम्मीदों की परवाह में टूट कर बिखरा तो
कभी टुकड़े टुकड़े जोड़ कर संभला भी ये दिल
कुछ पल का साथ फिर वो कह गये अलविदा
यादों में उनके कई पल, बहुत रोया भी ये दिल |

पर कुतरे हुए परिंदे सा फड-फडाता, कभी गिरता
फिर संभलता, लड़खड़ाते क़दमों को झकझोरता
कुछ रंजिशें की, कभी किसी से कुछ फरमाइसें की
कुछ पल शौक से जिंदगी के पन्नों की नुमयिसें की
शायरी का मज़हब टटोला, मयकशी में जीवन भी घोला
ज़ज्बातों की स्याही से कोरे कागज़ को पहनाया चोला|

मझधारों की मौज में कभी डूबता,
फिर उभरता
कभी थमी धार के संग बहता,
कभी पत्थरों की ठोकरें सहता
हौसले फिर भी खोने न दिए,
सब कुछ हिम्मत से सह लिए
उम्मीद में बस इतने कि
एक दिन वो पड़ाव आएगा
जहाँ वक़्त भी मेरे क़दमों में
इक बार गर्व से सर झुकाएगा
एक आज़ाद परिंदे सा एहसास
मेरे ख्वाबों का आँगन मेहकायेगा

Sunday, February 26, 2012

ऐ मेरे दोस्त

जीवन के हर मोड़ पर होगा तुम्हारा साथ
मैं डगमगाऊं तो संभलने को होगा तुम्हारा हाथ
राह में मिलते रहेंगे कई सारे पत्थर
झेल जाऊँगा सबको ख़ुशी से, तुम्हारे साथ
ऐ मेरे दोस्त, इतना खुशनसीब हूँ मैं
तुम्हे पाकर, जैसे जन्नत का मिल गया साथ
बस डरता हूँ हर पल, एक अनजाने से ख्वाब से
कुछ पल को भी कहीं छिन जाए ना तुम्हारा साथ
तुम्हारे बिना इस जीवन का कोई मोल नहीं
माटी का यह तन भी है अनमोल तुम्हारे साथ|

यादों के सुन्दर उपवन में जो कुछ फूल खिले हैं
उन्हें क्षण भर को भी कभी मुरझाने नहीं दूंगा
एक उद्दाग्र ग्रसित रोगी सा जो काँटे उगाये हैं
एक बदनसीब राही बनकर, उन्हें तुम्हे चुभोने नहीं दूंगा
तुम्हारी दोस्ती की जो अहेमियत है मेरे लिए
एक नासूर बन कर तुम्हे तड़पने नहीं दूंगा
ऐ मेरे दोस्त, जितना खुशनसीब हूँ मैं तुम्हे पाकर
तुम्हारी मुस्कराहट को आँसू में कभी बदलने नहीं दूंगा|

बस डरता हूँ हर पल, एक अनजाने से ख्वाब से
कुछ पल को भी कहीं छिन जाए ना तुम्हारा साथ
तुम्हारे बिना इस जीवन का कोई मोल नहीं
माटी का यह तन भी तो है अनमोल तुम्हारे साथ

Monday, July 02, 2007

मेरी गजल

आज सुबह, अरूण लालिमा खिडकी से आयी
हो गया सवेरा, चिडियाँ चहचहायी
मैने, मेज से तुम्हारी तस्वीर उठायी
कर लिया आलिंगन, नज़रें शरमायीं
मंद सी एक मुस्कान थी खिल आयी
अचानक, गज़ल लिखने की चाह जग आयी

काग़ज, कलम, दवात लिये बैठा
सुबह से शाम थी हुइ आयी
रंग गए बहुत सारे पन्ने
पर वो बात नहीं आ पायी
जब था मैने होंश संभाला, पहली बार
काग़ज पर लेखनी दौडायी
रंग गया था वो पन्ना
यह बात आज फिर याद थी आयी
एहसास हुआ कुछ ऐसा
जीवन दिये की बाती हो तुम
मैं शहज़ादा, शहज़ादी हो तुम
मैं आसमान का सूरज हूँ, मेरी किरणें तुम
तुम ही मेरी कविता हो,
गज़लों का आधार तुम
इन पन्नों पर क्या लिखता मैं
जब स्वर भी तुम, स्वरश्रिंगार भी तुम

Sunday, May 27, 2007

मजधार और मैं

हमने सुना था
मजधार में डूबती हैं कश्तियाँ
पर, देखा न कभी कि
मजधार की ओर जाती भी हैं कश्तियाँ

हुए अपनी कश्ती पर सवार
जीवन नदिया की बह रही थी धार
दिशा ली, अनुकूल धार
चल पडे, गुनगुनाते हुए खेवैये का सार

लहरों में हिचकोले खाती
कश्ती मेरी बढती जाती
राह में मिले कई मुसाफिर
पूछा, "किधर है तेरी मंजिल"
अहं ने मेरे दिया जवाब कुछ ऐसा
कि, "निकला हूँ मैं तो
ढूँढने को मजधार"

घबराकर सबने देखा
अथक समझाया, मैं न माना
"मूरख है तू, हारेगा
या तो लौट जा, या डूब जायेगा"

जब होंश आया
कश्ती थी जा लगी किनार
न कश्ती मेरी, न मेरा किनार
न जाने, कब आ गया मजधार
न जाने, कब टूटा मेरा अहंकार
डूब गयी थी मेरी नैया
डूब गया मेरे सपनों का संसार

Saturday, May 12, 2007

मन की निरूत्तरता

घनघोर घटा की वादी में
उनमुक्त मनपंछी की आजादी में
गगनदीप था उमड रहा
अलसायी घटा में घुमड रहा
मन मदमस्त हस्ती सा मचल रहा
प्रिय मिलन की तृष्णा में कुचल रहा
थामने को बढाया था हाथ किसी ने
साथ देने का दिया था विश्वास किसी ने
थम गये क्यूँ हमारे बढे हाथ
रूक गये क्यूँ सहम कर वो कदम
और आज भी
जाने क्यों मन यही सवाल करता है
जाने क्यों खुद से ही ये डरता है
खुद से हीं मन जब ये उत्तर माँगता है
परछायी की ओर मुँह कर
खुद को हीं निरूत्तर पाता है
कस्तूरी की तृष्णा में
दौड लगाते हुए मृग की तरह
अपनी कस्तूरी हीं नहीं ढूंढ पाता है

Thursday, May 10, 2007

एक ऐसी भी हसरत...

आँखों में हसरत है, इस दिल में शरारत है
हमारे दिल में अब बस आपकी मुहब्बत है
लब पे है जिसका नाम, वो आप हीं तो हैं
आँखों में जिसका जाम,वो आप हीं तो हैं
बस एक तमन्ना है, वो है आपको पाने की
जो मिले न आप हमें, ली कसम मर जाने की
बेचैनी बढती है, जब आप न होते हैं
ये दिल खो जाता है, जब आप से मिलते हैं
हम खोये रहते हैं, बस आपकी यादों में
सूना सा लगता है, जब आप न होते हैं
हर खुशी मेरी आप हीं हैं, बस आपकी चाहत है
जो हुए न आप मेरे, तो मौत को दावत है
ये दिल जो तडपता है, बस आपसे मिलने को
इसे चैन न मिलता है, बिना आपकी चाहत के
बडी हसरत है मेरी, कि मैं आपको पाऊँगा
जो हुए न आप मेरे, मैं तो मर जाऊँगा