Saturday, May 12, 2007

मन की निरूत्तरता

घनघोर घटा की वादी में
उनमुक्त मनपंछी की आजादी में
गगनदीप था उमड रहा
अलसायी घटा में घुमड रहा
मन मदमस्त हस्ती सा मचल रहा
प्रिय मिलन की तृष्णा में कुचल रहा
थामने को बढाया था हाथ किसी ने
साथ देने का दिया था विश्वास किसी ने
थम गये क्यूँ हमारे बढे हाथ
रूक गये क्यूँ सहम कर वो कदम
और आज भी
जाने क्यों मन यही सवाल करता है
जाने क्यों खुद से ही ये डरता है
खुद से हीं मन जब ये उत्तर माँगता है
परछायी की ओर मुँह कर
खुद को हीं निरूत्तर पाता है
कस्तूरी की तृष्णा में
दौड लगाते हुए मृग की तरह
अपनी कस्तूरी हीं नहीं ढूंढ पाता है

2 comments:

indranil said...

self realization !! its gud ..
apne aap ko jaanne ki koshish karna bahut zaroori hai..
acchi pradarshani hai shabdo ki..
padhke accha laga..
likhte raho aur seekhte raho!

vaibhav said...

i feel this is the best creation of poems by u.both as a technical as well as sentimental point of view.and may the "mrigA" find its kastuRi.